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BRICS में पहलगाम की एंट्री से बदली कूटनीति की तस्वीर

Ratna Netam
13 Sept 2026 3:54 PM IST
BRICS में पहलगाम की एंट्री से बदली कूटनीति की तस्वीर
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नई दिल्ली। BRICS शिखर सम्मेलन में आतंकवाद के मुद्दे पर चर्चा और पहलगाम आतंकी हमले का जिक्र वैश्विक कूटनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। भारत लंबे समय से आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सख्त रुख अपनाने की मांग करता रहा है। ऐसे में BRICS जैसे बड़े मंच पर आतंकवाद और सीमा पार हिंसा का मुद्दा उठना कई मायनों में अहम माना जा रहा है।
इस घटनाक्रम के बाद सवाल उठने लगे हैं कि क्या आतंकवाद के मुद्दे पर चीन और पाकिस्तान की पारंपरिक दोस्ती पर दबाव बढ़ रहा है? क्या बीजिंग अब इस मुद्दे पर पहले की तरह खुलकर इस्लामाबाद का समर्थन करने की स्थिति में नहीं है? इन सवालों पर अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जानकार अलग-अलग नजरिया रखते हैं।
पहलगाम हमले का मुद्दा क्यों बना चर्चा का विषय?
पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई की मांग उठाई। भारत का कहना रहा है कि आतंकवाद को किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता और इसके खिलाफ सभी देशों को एकजुट होकर कदम उठाने चाहिए।
BRICS जैसे मंच पर आतंकवाद का मुद्दा उठना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें दुनिया की कई बड़ी और उभरती अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं। भारत का प्रयास रहा है कि आतंकवाद को वैश्विक चुनौती के रूप में देखा जाए, न कि किसी एक देश की समस्या के तौर पर।
चीन-पाकिस्तान रिश्तों की पृष्ठभूमि
चीन और पाकिस्तान के संबंध लंबे समय से मजबूत माने जाते हैं। दोनों देशों के बीच रक्षा, व्यापार और रणनीतिक सहयोग के क्षेत्र में करीबी संबंध रहे हैं।
चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) दोनों देशों की साझेदारी का बड़ा उदाहरण है। चीन पाकिस्तान में बड़े स्तर पर बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं में निवेश करता रहा है।
हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के मुद्दे को लेकर दोनों देशों के बीच कई बार मतभेद दिखाई दिए हैं। भारत कई मौकों पर पाकिस्तान पर आतंकवादी संगठनों के खिलाफ पर्याप्त कार्रवाई न करने का आरोप लगाता रहा है।
क्या चीन पर बढ़ रहा है दबाव?
विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक राजनीति में चीन के लिए कई मुद्दों पर संतुलन बनाना जरूरी हो गया है। एक तरफ चीन के पाकिस्तान के साथ रणनीतिक संबंध हैं, वहीं दूसरी ओर वह खुद भी आतंकवाद से प्रभावित क्षेत्रों और वैश्विक सुरक्षा मुद्दों को लेकर अपनी चिंताएं जताता रहा है।
BRICS जैसे मंचों पर चीन को अन्य सदस्य देशों के साथ सहयोग बनाए रखने की जरूरत होती है। ऐसे में आतंकवाद जैसे मुद्दों पर पूरी तरह किसी एक पक्ष के साथ खड़ा होना उसके लिए कूटनीतिक चुनौती पैदा कर सकता है।
क्या चीन-पाकिस्तान दोस्ती कमजोर हो रही है?
जानकारों का कहना है कि चीन और पाकिस्तान के संबंधों को केवल एक घटना के आधार पर कमजोर नहीं माना जा सकता। दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी कई वर्षों पुरानी है और इसमें आर्थिक व सुरक्षा हित जुड़े हुए हैं।
हालांकि, यह भी सच है कि वैश्विक दबाव और बदलते कूटनीतिक समीकरणों के कारण चीन को कई मामलों में अधिक संतुलित रुख अपनाना पड़ सकता है।
BRICS में भारत की कूटनीतिक बढ़त?
भारत BRICS समेत कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के खिलाफ अपनी बात मजबूती से रखता रहा है। भारत का प्रयास है कि आतंकवाद को लेकर वैश्विक सहमति बनाई जाए और इसके खिलाफ साझा रणनीति तैयार हो।
विशेषज्ञों के अनुसार, BRICS में भारत की सक्रिय भूमिका उसकी बढ़ती वैश्विक स्थिति को दर्शाती है। नई दिल्ली लगातार विकास, सुरक्षा और वैश्विक सहयोग जैसे मुद्दों पर अपनी भूमिका मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
पाकिस्तान के लिए बढ़ी चुनौती?
अगर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के खिलाफ सहमति बढ़ती है तो पाकिस्तान पर भी अपने रुख को लेकर दबाव बढ़ सकता है। पाकिस्तान लंबे समय से आतंकवाद से जुड़े आरोपों का सामना करता रहा है और वह इन आरोपों से इनकार करता रहा है।
कूटनीतिक स्तर पर किसी भी देश के लिए यह चुनौती होती है कि वह अपने सहयोगी देशों के साथ संबंध बनाए रखते हुए वैश्विक मंचों पर अपनी छवि भी मजबूत करे।
आगे क्या असर पड़ सकता है?
BRICS में आतंकवाद का मुद्दा उठना आने वाले समय की वैश्विक राजनीति के लिए संकेत माना जा रहा है। हालांकि चीन और पाकिस्तान के संबंधों में तुरंत बड़ा बदलाव आने की संभावना कम है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बढ़ती चर्चा दोनों देशों की रणनीति को प्रभावित कर सकती है।
भारत लगातार यह संदेश दे रहा है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई किसी एक देश की नहीं बल्कि पूरी दुनिया की जिम्मेदारी है। वहीं चीन को भी आर्थिक और कूटनीतिक हितों के बीच संतुलन बनाकर आगे बढ़ना होगा।
कुल मिलाकर BRICS में पहलगाम का जिक्र भारत की कूटनीतिक कोशिशों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे चीन-पाकिस्तान संबंधों पर कितना असर पड़ेगा, यह आने वाले समय की अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों से साफ होगा, लेकिन इतना जरूर है कि आतंकवाद का मुद्दा अब वैश्विक मंचों पर पहले से ज्यादा प्रमुखता से उठ रहा है।
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